घड़ी की सुई

मेरा नाम पावनी है। घड़ी देख रहे हैं आप दीवार पर, ये मैं हूं, जैसे घड़ी की सुई की तरह मैं भी भाग रही हूं। बस मैं कभी घंटे और मिनट की सुई बन जाती हूं। कोई ख़ुशी नहीं बस घड़ी सा टिक- टिक जीवन कट रहा है। घड़ी में 12 बजने वाले हैं । अभी तक सिद्धांत का कोई मैसेज या कॉल नहीं आया है । मिस कॉल भी नहीं है। मुझे को बिल्कुल भी बेचैनी नहीं है। यह रोज की बात है मेरी आदत बन चुकी है। मेरी शादी को 5 साल हो चुके हैं। अब मैं कभी सिद्धांत को किसीभी बात के लिए नहीं टोकती हूं। लेकिन मुझे अपनी ये आदत बिल्कुल अच्छी नहीं लगती है।

मेरे मायके में कभी ऐसा नहीं होता था। मैं हमेशा छोटी- छोटी बातों पर जोर देती थी। घर में साफ- सफ़ाई, सामान अपनी जगह रखना वगैरा – वगैरा। कभी घरवाले हंसते थे कभी मुझे सनकी कह देते थे। पर 24 घंटे कोई हर जगह मुझे ही विलेन नहीं बनाता था। 12:30 बजने को आए मैंने ने कुछ नहीं खाया, पर फिर भी ना उसे प्यास महसूस हो रही है और ना ही भूख। 

सिद्धांत मल्टीनेशनल कंपनी में मैनेजर है इसलिए बहुत जिम्मेदारी है उसके सिर पर, घर की, ऑफिस की, समाज की और अपनी खुद की भी। उसके पास बिल्कुल समय भी नहीं है। शुरुआत में ऐसा कुछ नहीं था मैं कुछ ना कुछ कह देती थी, जैसे मैसेज क्यों नहीं किया, कॉल कर देते अगर लेट हो रहे हो तो, मोजे ठीक से रखो , सामान इधर- उधर मत फेंको। जरा सा -जरा सी बात ही बड़ी महंगी पढ़ती थी।  सिद्धांत तुरंत घरवाले व्हाट्सएप ग्रुप में पत्नी के अत्याचार से पीड़ित पति की तरह msg कर देते था। और मुझसे कहते थे कि मैं जॉबलेस हूं। इसीलिए इतनी बातें नोटिस करती हूं। सच भी है शायद हाउसवाइफस के पास घर संभालने के अलावा कोई काम ही नहीं होता है। मेरी देवरानी वाणी जॉब करती है, उसका बहुत इम्पोर्टेंस है घर में। सब लोग कहते हैं वो जितना कर लेती है , बहुत बड़ी बात है। सच भी है कि जितना वाणी संभाती है काबिले तारीफ है। लेकिन अगर मैं केवल घर की देख- भाल करती हूं तो मेरा कोई सम्मान नही क्या। (in very sad voice)

“ सिद्धांत के इस व्यवहार को पहले- पहल मायके में सब मजाक समझते थे पर बाद में फिर मां को बुरा लगने लगा। वो बोली ” क्या तुमको कुछ नहीं सिखाया मैंने? जो दामाद जी हमेशा तुम्हारी कमी बताते रहते हैं। ” मैंने हसकर कहा अरे मां ये आजकल का चलन है सब इस तरह सारे अपना मूड हल्का करते हैं।” मां को लगा उनकी समझ कम हो गई है और वो चुप हो गई। लेकिन मैं भी 24 घंटे एक ही तरह के ताने, मजाक में ही सही सुनते सुनते पक गई थी। मेरा नॉर्मल रहना मुश्किल हो गया। लिहाज़ा मैंने व्हाट्स एप ग्रुप लेफ्ट कर दिया। उस दिन सिद्धांत और मुझमें बहुत बहस हुई मैंने बोला कि मैं उनके पत्नी वाले ताने और जोक बर्दाश्त नहीं कर सकती । उनके मुताबिक मैं जमाने के विपरीत हूं और मुझे  नहीं पता की मजाक कैसे हैंडल किया जाता है। ना कभी मेरे घर वाले सिद्धांत के विरुद्ध बोलते है और ना ही उनके घर वाले कभी अपनी बहु का साथ देते हैं। लिहाजा हर तरफ से मेरी हार थी। घर और बच्चे संभालने में सिद्धांत कोई भी योगदान नहीं दे सकते हैं, इतना भी नहीं कर सकते हैं कि मुझ पर बेवजह ताने ना कसे जाएं। मुझे कुछ ना बोलने के अलावा कोई उपाय नहीं समझ आया, क्या बोलूं। और मेरे बोलने ना बोलने से कोई फर्क भी तो नहीं पड़ता किसीको।

4 सालों मैं केवल घड़ी हूं जो दूसरों के लिए हर वक्त चलती रहती है बिना थके , बिना कुछ कहे ।
( घर की डोर बेल बजती है) लगता है सिद्धांत आ गए हैं मुझे दरवाजा खोलना चाहिए। 

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