गिद्ध और लोमड़ी

गिद्ध, भेड़िए और लोमड़ीसब बैठें हैं, ताक में कौन पहले हाथ मरेगा लाशों के अंबार में। कौन बचाए मुर्दों कोभूखों का खाना बनने से,लोमड़ी जैसी आखों से,जंगली चोचों और पंजो से। थोड़े बचे हुए,झांक रहे दरारों सेलूटी उम्मीद, बुझे चेहरेचीख रहे अंधियारों से। गिद्ध, भेड़िए और लोमड़ीसब बैठें हैं ताक में, फटने लगा आसमानपैने दांतों वाले ठहाकों से,आए कौन बचाने मुर्दों कोयहां जिंदा जलाए श्मशानों … Continue reading गिद्ध और लोमड़ी

साधारण

मैं हूं साधारण, आम हूँ मैं, दो हाथ दो पैर, दो- दो आँख और कान, सब कुछ सामान्य, सहज सबके सामान! साधारण हूँ मैं, खास जो होता है , मुझमे नही है, सब जैसा हूँ मैं, पर मुझ जैसे सब नहीं हैं, इसीलिए हूं साधरण मैं, भागता रहता हूँ हर घड़ी, महत्वपूर्ण होने की आस में, योग्य बनने की होड़ में, क्योंकि हूँ साधारण मैं, … Continue reading साधारण

क्या लिखूं

सोचती हूं क्या लिखूं, अपने नाम के साथ तुम्हारा नाम लिखूं, बार बार श्याम लिखूं मुझे, तुम साथ रहो यह अरमान लिखूं, सोचती हूं क्या लिखूं, तुम को साथ साथ उड़ा कर ले चलूंं, तुमको बादल खुद को हवा लिखूं, छिप जाऊँ सांझ ढले तुम में, तुमको घोंसला खुद को पंछी लिखूं, सोचती हूं क्या लिखूं, कभी ख़त्म ना हो वह किताब लिखूं, कभी सूख … Continue reading क्या लिखूं